इसके बाद आती है वह प्रसिद्ध इबारत: "ला'अनल्लाहु उम्मतन जहलेत हक्ककुम..." – यानी खुदा उन लोगों पर लानत भेजे जो आपके हक को जानते हुए भी उसे भूल गए, और उन लोगों पर जिन्होंने आपकी विरासत को नष्ट किया।
A standard Hindi pamphlet or digital version usually includes: ziyarat e nahiya in hindi
यह ज़ियारत साल के किसी भी दिन और किसी भी समय पढ़ी जा सकती है, लेकिन परंपरा के अनुसार: ziyarat e nahiya in hindi
ज़ियारत-ए-नाहिया (Ziyarat al-Nahiya al-Muqaddasa) ziyarat e nahiya in hindi
ज़ियारत-ए-नाहिया (अरबी: زیارة الناحية) एक प्रसिद्ध ज़ियारत (सलाम) है जो हमारे 12वें इमाम, हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) ने हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और करबला के शहीदों को संबोधित करते हुए पढ़ी थी। इस ज़ियारत में इमाम हुसैन (अ.स.) की मसीबतों का बयान इतना मार्मिक है कि इसे पढ़ते हुए हर मोमिन की आंखें भर आती हैं।
ज़ियारत-ए-नाहिया सिर्फ एक दुआ या प्रार्थना नहीं है; यह इतिहास के उस दर्दनाक दिन की गवाही है। इसे हिंदी में पढ़ने और समझने से हमें करबला की त्रासदी को गहराई से महसूस करने का मौका मिलता है। यह ज़ियारत इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ आध्यात्मिक रिश्ता मजबूत करती है और हमें जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा देती है।